सफर जारी है 33
#सफर_जारी_है_33 कल ताराचंद जी के साथ खेतों में घुमते हुए घर पहुंचे तो पिताजी कमरे के आगे चौक पर बैठे थे। खेतों में काफी समय लगा दिया तो ताराचंद जी सीधे स्कूल में अपने कमरे जाना चाहते थे। परन्तु पिताजी को देखकर मेरे साथ ही वहीं हथाई में मशगूल हो गए। मेरे छोटे चाचा श्री शंकर और मेरे पिताजी के चचेरे भाई श्री जगदीश भी हमें देखकर हथाई के उद्देश्य से पास आकर बैठ गए। #हथाई_भी_आजकल_लुप्त_होती_जा_रही_है_भला_हो_हमारे_गांवो_का_जिन्होने_इसे_बचा_रखा_है गांवों में भी धीरे धीरे बदलती सोच और माहोल के कारण लोग अपने आप में सिमटते जा रहें हैं। इसलिए गांव आने पर इस प्रकार के हथाई के मौके मैं छोड़ता नहीं हूं। हथाई चलते चलते पढ़ाई के बिंदु पर आ गई। जिन बच्चों के माता-पिता उन्हें पढ़ाना चाहते हैं और जो या तो स्कूल पहुंचते नहीं या फिर बीच में भाग जाते हैं, उनके न पढ़ने का दोष किसे दिया जाए, यह चर्चा का विषय था। हम सब अपने अपने मत रख रहे थे तो जगदीश चाचा श्री बोले कि मां बाप को क्या दोष दें। मुझे बुआजी के पास 32 एम एल पढ़ने भेजा। हम रतनपुरा पढ़ने जाते थे। बुआजी हमारे साथ चुरमा और अचार रोट...