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Showing posts from June 21, 2020

सफर जारी है 33

#सफर_जारी_है_33 कल ताराचंद जी के साथ खेतों में घुमते हुए घर पहुंचे तो पिताजी कमरे के आगे चौक पर बैठे थे। खेतों में काफी समय लगा दिया तो ताराचंद जी सीधे स्कूल में अपने कमरे जाना चाहते थे। परन्तु पिताजी को देखकर मेरे साथ ही वहीं हथाई में मशगूल हो गए। मेरे छोटे चाचा श्री शंकर और मेरे पिताजी के चचेरे भाई श्री जगदीश भी हमें देखकर हथाई के उद्देश्य से पास आकर बैठ गए। #हथाई_भी_आजकल_लुप्त_होती_जा_रही_है_भला_हो_हमारे_गांवो_का_जिन्होने_इसे_बचा_रखा_है गांवों में भी धीरे धीरे बदलती सोच और माहोल के कारण लोग अपने आप में सिमटते जा रहें हैं। इसलिए गांव आने पर इस प्रकार के हथाई के मौके मैं छोड़ता नहीं हूं। हथाई चलते चलते पढ़ाई के बिंदु पर आ गई। जिन बच्चों के माता-पिता उन्हें पढ़ाना चाहते हैं और जो या तो स्कूल पहुंचते नहीं या फिर बीच में भाग जाते हैं, उनके न पढ़ने का दोष किसे दिया जाए, यह चर्चा का विषय था। हम सब अपने अपने मत रख रहे थे तो जगदीश चाचा श्री बोले कि मां बाप को क्या दोष दें। मुझे बुआजी के पास 32 एम एल पढ़ने भेजा। हम रतनपुरा पढ़ने जाते थे। बुआजी हमारे साथ चुरमा और अचार रोट...

सफर जारी है 32

#सफर_जारी_है_32 आज का सफर घर की तरफ। कल रविवार है और विद्यालय का अवकाश। अमूमन हर शनिवार घर आता हूं और सोमवार को सीधे विद्यालय। छः दिन बाद घर लोटने की खुशी कुछ और होती है। इस खुशी में विघ्न डालने का काम कर रही है भीड़। मैं विद्यालय से सूरतगढ़ पहुंचता हूं तब तक बस के चलने का समय हो जाता है और मैं बस लगभग बस स्टैंड से बाहर निकलने के बाद ही पकड़ पाता हूं। आज भी वही स्थिति है। भीड़ में जैसे तैसे जगह बनाकर आगे निकला तो एक सीट किसी ने रोक रखी है। मैंने कहा तो मुझे बैठा लिया। मैं गांव के मार्ग में आने वाले फोग, किकर, जांटी और खेतों में खड़ी फसलों को अपने सपनों में देखता हुआ सीट पर बैठा हूं। मैं सोच रहा हूं कि खेतों में हर तरफ सरसों के फूलों की पीली चादर धीरे धीरे हरी होती जा रही है, क्योंकि सरसों अब पकाव की तरफ है। गेहूं और जौ के बालियां निकलने लगी है। चने की डालियां फलियों से लदी हुई है। बसंत के मौसम में चल रही ठंडी हवा कभी अच्छी लगती है, कभी चुभती है। मौसम का हाल भी अजीब है। कभी धूप अच्छी लगती है, कभी भागकर छांव में बैठने का मन करता है। मैं अपनी तंद्रा में डुबा बैठा हूं कि हंसी की एक लोर ...

सफर जारी है 31

#सफर_जारी_है_31 राम-राम साथिड़ो। मौसम रो मिजाज बदल रेयो है। स्कूलां रो टैम भी सरकार बदळ दियो। सुवारै नौ बज्यां ताईं नौकरी करणआळै लोगों रै साथै साथै बिजा लोग भी, जिणा नै कठै ही जावणो हुवै, घर स्यूं चाल पड़ै। इण'रै कारण जकी बस स्यूं म्हूं स्कूल कानी बहीर हुवूं उण मांय भीड़-भड़ाको हो ज्यावै। आज भी ओही'ज हाल है। म्हूं, असलम भाई अर भाग सिंह जी बस अड्डे स्यूं ही बस मांय बैठ ज्यावां। फैर भी रिलायंस पैंट्रोल पंप ताईं आंवते आंवते ही कोई सवारी इसी आज्यावै जकी नै‌ सीट देणी पड़ ज्यावै। जिंया ही बस पीजी कॉलेज अड्डे माथै रुकी। अेक जनानी सवारी बस मांय चढ़ी। उण'रै साथै दो टाबर भी है। बा मांय स्यूं अेक नै म्हूं आपरै गोडा माथै बिठाय लियो। जनानी सवारी नै दैख'र असलम भाई आपरी सीट स्यूं उभो होय उणा नै बिठा दिया। बस आपरी पूरी स्पीड स्यूं दौड़'री है। म्हूं अर असलम आपरी बंतळ लाग रिया हां। बीच बीच मांय ध्यान म्हारै कनै बैठी जनानी अर उणरै टाबर री बंतळ कानी भी जाय रियो हो। टाबर बोल्यो कै मां कई लोग किता कोझा हुवै। मां रो ऊथळौ बड़ो जोरदार हो। बा बोली कै बेटा, #मिनख_रो_कै_कोझो_हुवै_उणरा_का...

सफर जारी है 30

#सफर_जारी_है___ आज जब तक बस स्टैंड के गेट पर पहुँचा तब तक बस बाहर निकल आई है। परिचालक जोर-जोर से गंगानगर.... गंगानगर.... गंगानगर की आवाज लगा रहा है। इस बस के बाद वाले रूट की बस का परिचालक भी साथ साथ चल रहा है और जल्दी चलने के लिए कह रहा है। मैंने इशारे से बस रुकवाई। ये सोचते हुए कि आगे वाले फाटक तक जाने में समय लगेगा, पिछले फाटक से ही बस में सवार हो गया। पीछे वाली सीट फाटक के सामने होने के कारण हवा तेज लग रही है। कितनी दूर जाना है बीस मिनट में पालीवाला पहुँच जाऊँगा, ये सोचते हुए मफलर से मुँह ढककर बैठ गया। बस मंथर गति से आगे बढ़ रही है। इंदिरा सर्किल पर बस रुकी तो एक महिला अपने पांच साल के बच्चे के साथ आगे वाले गेट से बस में सवार हुई। आगे एक दो सीटें खाली थी। जब भी वह किसी सीट पर बैठने लगती बच्चा कह रहा है और पीछे चलें। ऐसा करते करते वह अपनी माँ के साथ सबसे अंतिम सीट पर ले आया जहां मैं बैठा हूँ। तेज हवाओं से परेशान होकर कुछ देर बाद वह महिला बोली, "बेटा आगे सीट खाली है। पीछे कहाँ लाया है? तेज हवा लग रही है। आगे चलें क्या?" बेटे के मुंह से बड़ा शानदार जवाब निकला...

सफर जारी है 29

#सफर_जारी_है_29 शीतकालीन अवकाश के बाद आज विद्यालय खुलें है। आज धूप होते हुए भी ठंडी हवा चलने के कारण सर्दी महसूस हो रही है। अर्द्धावकाश का समय है। सभी साथी बैठे हथाई कर रहे हैं। एक आदमी हमारे पास आया और बोला कि गुरुजी मेरे पास पेन, कलेंडर,जुराब आदि कुछ सामान है,खरीद लिजिए। सभी उसकी तरफ देखने लगे। वह बोला "गुरुजी मेरा हाथ पोलियो के कारण खराब है। इसलिए मैं कुछ सामान बेचकर पेट पालता हूं। कुछ लोगों ने कहा कि तेरे से काम नहीं होता है तो मांग कर खा लिया कर। मुझे भीख मांगने से अच्छा भूख मरना ठीक लगा। इसलिए मैं यह काम करने लगा। इससे मेरा गुज़ारा हो जाता है।" हमने उसके हाथों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था। अब उसकी बातें सुनकर ध्यान गया। हमें उसकी खूद्दारी पर गर्व हुआ। सब साथियों ने उससे कुछ सामान खरीदा। उस आदमी की बातें उन लोगों की सोच पर तमाचा है जो किसी कमी का रोना रोते रहते हैं और और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दुसरों पर आश्रित हो‌ जाते हैं। जितना कुछ करने का सामर्थ्य हमारे अंदर है यदि उतना काम हम पूर्ण समर्पण और मेहनत से करें तो हम जीवन में कभी किसी पर ...