#कुछ_यादें_कुछ_बातें #लाकडाउन_के_बहानें बचपन की नादानियां याद आती है तो चेहरे पर बरबस मुस्कान खिंची चली आती है। आज की पीढी के हिसाब से देखें तो मुझे तो कम से कम नासमझ समझा जा सकता है। मेरे ज्यादातर सहपाठी भी इस वर्ग में शामिल माने जा सकते हैं। गाँव में स्कूल नहीं होने के कारण माध्यमिक तक की शिक्षा मैंने अपने अलग-अलग रिश्तेदारों के यहाँ रहकर प्राप्त की। इस क्रम में उच्च प्राथमिक शिक्षा यानि 6 से 8 कक्षा मैंने मेरे पिताजी के ननिहाल कूपंली रहकर प्राप्त की। मैं जिस घटना का जिक्र करने जा रहा हूँ वह आठवीं की है। मैं आठवीं कक्षा में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय कूपंली में अध्ययनरत था। मेरे सहपाठियों में अशोक चौहान, वेद डूडी, मुकेश खीचङ, भैराराम, रामकुमार मेघवाल आदि खूब धमाल मचाया करते। उस समय के गुरुजनों में मनीराम जी सुथार, मल्ली जी, मीणा जी, यादव जी और चावला जी होते थे। मेरा सौभाग्य है कि इनमें से चावला जी यानि पृथ्वीराज जी चावला और मैं वर्तमान में एक ही विद्यालय में अध्यापन करवा रहे हैं। हुआ यूँ कि मुकेश यादव जी ने अपना तबादला अपने गाँव की तरफ करवा लिया। विद्यालय में सूचना दे दी गई क...
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