#सफर_जारी_है__6 बस सर्किल से रवाना हो रही है। अब बस में पग धरने की जगह नहीं है। बस में हर तरफ से आवाजें आ रही है।सब अपनी अपनी हथाई में व्यस्त। कन्डेक्टर टिकट काटने में लगा है। इस गर्मी के मौसम में बच्चों का बुरा हाल है। बीच बीच में बच्चों के रोने की आवाज आ रही है। जिनको चुप कराने के असफल प्रयास किया जा रहा है। इन सबसे ध्यान हटाने के लिए मैंने साथ बैठे गुरूजी के साथ बातचीत शुरू कर दी। सामान्य घर परिवार की बातें करते करते विद्यालय की बात चल पड़ी। बातों बातों में गुरूजी बोले "और सब ठीक है। हमारे पास स्टाफ कम है। क्या करें.." "गुरूजी हमारे पास स्टाफ कम जरूर है, कमजोर नहीं है। यदि हमने सोच लिया कि हम कम है हमसे क्या होगा, समझो खेल खत्म। हमें ये सोचना है कि हम कितना कर सकते हैं। हमें नजरिया बदलना होगा। कक्षा 5 तक मेरे दिमाग में ये बात आने लग गई थी कि मैं एक पैर से विकलांग हूं। मैं जिंदगी में कुछ नहीं कर पाऊंगा। नकारात्मक विचार दिमाग में घर कर रहे थे। कक्षा 6 मेरी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था। उस समय मुझे ऐसे शिक्षक मिले जिनका मैं आज भी शुक्रगुजार हूं और जिंदगी भर रहूं...
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