सफर जारी है 30
#सफर_जारी_है___
आज जब तक बस स्टैंड के गेट पर पहुँचा तब तक बस बाहर निकल आई है। परिचालक जोर-जोर से गंगानगर.... गंगानगर.... गंगानगर की आवाज लगा रहा है। इस बस के बाद वाले रूट की बस का परिचालक भी साथ साथ चल रहा है और जल्दी चलने के लिए कह रहा है। मैंने इशारे से बस रुकवाई। ये सोचते हुए कि आगे वाले फाटक तक जाने में समय लगेगा, पिछले फाटक से ही बस में सवार हो गया। पीछे वाली सीट फाटक के सामने होने के कारण हवा तेज लग रही है। कितनी दूर जाना है बीस मिनट में पालीवाला पहुँच जाऊँगा, ये सोचते हुए मफलर से मुँह ढककर बैठ गया। बस मंथर गति से आगे बढ़ रही है।
इंदिरा सर्किल पर बस रुकी तो एक महिला अपने पांच साल के बच्चे के साथ आगे वाले गेट से बस में सवार हुई। आगे एक दो सीटें खाली थी। जब भी वह किसी सीट पर बैठने लगती बच्चा कह रहा है और पीछे चलें। ऐसा करते करते वह अपनी माँ के साथ सबसे अंतिम सीट पर ले आया जहां मैं बैठा हूँ। तेज हवाओं से परेशान होकर कुछ देर बाद वह महिला बोली, "बेटा आगे सीट खाली है। पीछे कहाँ लाया है? तेज हवा लग रही है। आगे चलें क्या?"
बेटे के मुंह से बड़ा शानदार जवाब निकला, जिसका मतलब इस उम्र में उसे भी पता नहीं है। ध्यान से पढ़ना....
"#मुझे_यहाँ_पिछे_बैठकर_दुनिया_देखनी_है_फिर_आगे_चलेंगे।"
कितनी गहरी बात कह दी भोलेपन के साथ। हमें यदि दुनिया का मुकाबला करना है, दुनिया में अपनी पहचान बनाए रखनी है तो इस बच्चे की तरह पीछे बैठकर दुनिया को समझना होगा। चाहे हवाएं विपरीत चल रही हों। इन विपरीत हवाओं को सहन करते हुए दुनिया को देखकर उसका सामना करते हुए हमें अपने कर्त्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ना है। बच्चे का भाव केवल ये था कि मुझे बस से बाहर देखना है जो यहाँ से ठीक दिखाई दे रहा है। परंतु इसे हम किसी भी सन्दर्भ के साथ जोड़कर जीवन का फलसफा सीख सकते हैं।
.........मिलते हैं एक नए सफर में......
.......तब तक जुड़े रहे सफर के साथ...... अपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाते रहें....
........ जयहिंद......
सफर जारी है...…………
आज जब तक बस स्टैंड के गेट पर पहुँचा तब तक बस बाहर निकल आई है। परिचालक जोर-जोर से गंगानगर.... गंगानगर.... गंगानगर की आवाज लगा रहा है। इस बस के बाद वाले रूट की बस का परिचालक भी साथ साथ चल रहा है और जल्दी चलने के लिए कह रहा है। मैंने इशारे से बस रुकवाई। ये सोचते हुए कि आगे वाले फाटक तक जाने में समय लगेगा, पिछले फाटक से ही बस में सवार हो गया। पीछे वाली सीट फाटक के सामने होने के कारण हवा तेज लग रही है। कितनी दूर जाना है बीस मिनट में पालीवाला पहुँच जाऊँगा, ये सोचते हुए मफलर से मुँह ढककर बैठ गया। बस मंथर गति से आगे बढ़ रही है।
इंदिरा सर्किल पर बस रुकी तो एक महिला अपने पांच साल के बच्चे के साथ आगे वाले गेट से बस में सवार हुई। आगे एक दो सीटें खाली थी। जब भी वह किसी सीट पर बैठने लगती बच्चा कह रहा है और पीछे चलें। ऐसा करते करते वह अपनी माँ के साथ सबसे अंतिम सीट पर ले आया जहां मैं बैठा हूँ। तेज हवाओं से परेशान होकर कुछ देर बाद वह महिला बोली, "बेटा आगे सीट खाली है। पीछे कहाँ लाया है? तेज हवा लग रही है। आगे चलें क्या?"
बेटे के मुंह से बड़ा शानदार जवाब निकला, जिसका मतलब इस उम्र में उसे भी पता नहीं है। ध्यान से पढ़ना....
"#मुझे_यहाँ_पिछे_बैठकर_दुनिया_देखनी_है_फिर_आगे_चलेंगे।"
कितनी गहरी बात कह दी भोलेपन के साथ। हमें यदि दुनिया का मुकाबला करना है, दुनिया में अपनी पहचान बनाए रखनी है तो इस बच्चे की तरह पीछे बैठकर दुनिया को समझना होगा। चाहे हवाएं विपरीत चल रही हों। इन विपरीत हवाओं को सहन करते हुए दुनिया को देखकर उसका सामना करते हुए हमें अपने कर्त्तव्य मार्ग पर आगे बढ़ना है। बच्चे का भाव केवल ये था कि मुझे बस से बाहर देखना है जो यहाँ से ठीक दिखाई दे रहा है। परंतु इसे हम किसी भी सन्दर्भ के साथ जोड़कर जीवन का फलसफा सीख सकते हैं।
.........मिलते हैं एक नए सफर में......
.......तब तक जुड़े रहे सफर के साथ...... अपने अमूल्य विचारों से अवगत करवाते रहें....
........ जयहिंद......
सफर जारी है...…………
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