सफर जारी है 29

#सफर_जारी_है_29

शीतकालीन अवकाश के बाद आज विद्यालय खुलें है। आज धूप होते हुए भी ठंडी हवा चलने के कारण सर्दी महसूस हो रही है। अर्द्धावकाश का समय है। सभी साथी बैठे हथाई कर रहे हैं। एक आदमी हमारे पास आया और बोला कि गुरुजी मेरे पास पेन, कलेंडर,जुराब आदि कुछ सामान है,खरीद लिजिए। सभी उसकी तरफ देखने लगे।
वह बोला "गुरुजी मेरा हाथ पोलियो के कारण खराब है। इसलिए मैं कुछ सामान बेचकर पेट पालता हूं। कुछ लोगों ने कहा कि तेरे से काम नहीं होता है तो मांग कर खा लिया कर। मुझे भीख मांगने से अच्छा भूख मरना ठीक लगा। इसलिए मैं यह काम करने लगा। इससे मेरा गुज़ारा हो जाता है।"
हमने उसके हाथों की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था। अब उसकी बातें सुनकर ध्यान गया। हमें उसकी खूद्दारी पर गर्व हुआ। सब साथियों ने उससे कुछ सामान खरीदा।
उस आदमी की बातें उन लोगों की सोच पर तमाचा है जो किसी कमी का रोना रोते रहते हैं और और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दुसरों पर आश्रित हो‌ जाते हैं। जितना कुछ करने का सामर्थ्य हमारे अंदर है यदि उतना काम हम पूर्ण समर्पण और मेहनत से करें तो हम जीवन में कभी किसी पर आश्रित नहीं रहेंगे। हमें हमारा ध्यान हमारी कमीयों से अपनी क्षमताओं पर स्थिर करना होगा। एक बार ऐसा करके देखें। जीवन में आंनद ही आंनद ही होगा......

सफर जारी है........

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