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सफर जारी है 38

 #सफर_जारी_है_38 मौसम फिर बदलाव की तरफ है। बादल अपना डेरा लेकर वापस आ गए हैं। सूर्योदय के बाद भी हल्की ठंड बरकरार है। बस आ गई। आज भीड़ ठीक-ठाक है। मेरी सीट आरक्षित है। असलम भाई बस स्टैंड से ही बस में बैठ जाते हैं और मेरी जगह भी रोक लेते हैं। आज सीट भर चुकी है। एक बुड्ढी मां को असलम भाई ने सीट दे दी। मुझे देखते ही खड़े होते हुए बोले,"आओ रामजी। बैठो।" मैंने मना किया फिर भी ज़बरदस्ती बिठा ही दिया। बस रफ्तार पकड़ चुकी है। मानकसर आवरब्रिज से निकलते समय धान की फसल की सुगंध मुझे अपनी और आकर्षित करने लगी। क्या शानदार नजारा है। पहले जो चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नज़र आती थी अब वहां पिली चद्दर बिछी है। धान अब परवान पर है। जहां तक नजर जाती है धान की लहलहाती फसल नजर आ रही है। इस सुंगध में किसान के पसीने की गंध भी शामिल है। काफी मेहनत का परिणाम है यह सुगंध। बुड्ढी मां ने पास ही खड़े जानकर युवक के साथ बातचीत शुरू कर दी। घर परिवार की बातें करते हुए उह युवक से पुछा,"आजकल क्या कर रहे हो। कहीं काम लगे हो या फिर खाली बैठे हो।" "मैंने दुकान कर ली दादी। दो तीन साल इधर उधर काम...