#सफर_जारी_है_19 आज नगर पालिका चुनाव नतीजों का दिन है। तेजाजी चौक से खेजड़ी मोड़ जहां से बस में सवार होता हूं वहां तक वाहनों और भावी पार्षद समर्थकों की रेलमपेल है। कुछ नतीजे आ चुके हैं और जीतने वाले पक्ष के समर्थक सड़क पर ब्रेक डांस कर रहे हैं। खेजड़ी मोड़ पर भी पुलिस का पूरा जाब्ता है। आज बस कुछ आगे जाकर रुकी। बस में पिछली खिड़की से प्रवेश करते ही दूसरी सीट पर एक जानकार बैठें हैं। मैं भी उनके पास आकर बैठ गया। बैठते ही नमस्कार करने के बाद उनके मुंह से निकला कि मास्टर बड़े कंजूस होते हैं। मैंने पुछा कि ऐसे कैसे कहा। बोले, और क्या तो। रोज बस में उतरना चढ़ना। कार नहीं खरीद सकते। पैसों के पूत बने बैठे हो। मैं बोला, इस मार्ग पर प्रत्येक दस मिनट बाद बस सर्विस है। बीस रूपए आने के और बीस जाने के। साथ में सार्वजनिक वाहन। किसी प्रकार की चिंता नहीं। पर्यावरण प्रदूषण करना और फिजूलखर्ची करना कहां जरूरी है। यह सुनकर बोले कि हर जगह रुपए बचने चाहिए, इसी बात पर ध्यान रहता है। बाजार में सामान खरीदते हैं तो भी यही हाल रहता है। मैंने कहा, शिक्षक अपने विद्यार्थियों को शिक्षा देता है बचत की और यदि खुद फि...
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Showing posts from May 29, 2020
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सफर जारी है.....18..…( पिता ) कहा जाता है कि जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे उनका रवैया बदलने लगता है(सभी तो नहीं )। वे माता-पिता की अवहेलना करने लगते हैं। विशेषकर पिता के बारे में। वे अपनी जायज नाजायज गतिविधियों में उनको अड़चन मानने लगते हैं। लेकिन वे अपने पिता की मंशा को, जो कि इनकी भलाई के लिए होती है, समझ नहीं पाते। कुछ तो ऐसा भी कहते हैं कि इन्होंने हमारे लिए किया क्या है या इन्हें हमारी कोई फ़िक्र नहीं है। सभी ऐसे नहीं होते हैं इसलिए कोई अन्यथा नहीं लें। हम अपने माता-पिता के द्वारा हमारे लिए किए गए बलिदान का बदला नहीं चुका सकते। वे आज भी हमारे लिए फिक्रमंद रहते हैं । मध्यावधि अवकाश पर घर आया हुआ हूं। आज दोपहर में भाई ट्रैक्टर लेकर खेत जा रहा है तो मैं भी उसके साथ हो लिया। खेत ज्यादा दूर नहीं है । घर से लगभग 500-600 मीटर दूरी पर । 15-20 मिनट बाद पिताजी भी खेत पहुंच गए। कुछ देर खेत में घूमने के बाद वापस पैदल ही घर चलने का मानस बनाया। भाई खेत में काम लग गया। वो तो शाम तक घर जा पाएगा। मैं जब घर की तरफ चला तो पिताजी बोले,"कौन-से रास्ते से जाएगा। उधर खेत मे...
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सफर_जारी_है.....17 सूरतगढ़ से सफर शुरू हो चुका है। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। बस मंथर गति से आगे बढ़ रही है। एक दो सवारियों को छोड़कर सभी अपनी अपनी सीट पर विराजमान। मैं और असलम भाई अपनी बातों में मशगूल हैं। हमारी सीट के बराबर एक महाशय खड़े हैं। कोशिश करने पर उनको बैठने की जगह मिल सकती है लेकिन हमारे से पिछे की सीट पर बैठी सवारी के साथ हथाई लगें हैं। उनकी बातों से ये तो जाहिर हो गया कि दोनों अध्यापक पद पर है। जो महाशय खड़े हैं उन्होंने ने पूछा,"क्या तैयारी चल रही है।" जवाब आया,"अभी तो कुछ नहीं। मैंने बी पी एड भी कर रखी है। शारीरिक शिक्षक भर्ती का परीक्षा दे रखी है। परिणाम का इंतजार है । "पेपर कैसा हुआ।" "बढ़िया हुआ है। उम्मीद है हो जाएगा। तभी तो मैं तैयारी छोड़ रखी है। " " आपने एम ए कर रखी है। व्याख्याता की तैयारी कर लेते।" "नहीं, मेरा तो पी टी आई में हो जाए तो इस माथापच्ची से पीछा छुट जाए। मुझे पढ़ाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।" सीट पर बैठी सवारी बड़ी लापरवाही से कहा। मैं सदमे में हूं। कमाल है पढ़ाना भी माथापच्ची लग रही ...