सफर जारी है -1 मित्रां दी छतरी तों उड़ गई.... गाना चल रहा है लोकल छतरगढ़ से सूरतगढ़ बस में। मित्रों की छतरी से उड़ के बैठी कहां किसी को नहीं पता। 390 आर डी से बस में चढ़ा तो भारी भीड़। कुछ चैले बस में बैठे थे तो सीट का जुगाड़ हो गया। बस में पग रखने की जगह नहीं है। एक तरफ गाना चल रहा है तो दुसरी तरफ लोगों की हथाई। इस शोर शराबे के बीच मेरा ध्यान पीछे की सीट पर चल रही चर्चा पर गया। कोई घरेलू समस्या पर बातें चल रही है। एक ने कहा कि आपके परिवार वाले कुछ कहते नहीं। परिवार वालों की बात छोङो, यह कहते हुए दूसरा बोला, "भाई एक बार कोई व्यापारी अपनी घोड़ी पर सवार होकर कहीं जा रहा था। रास्ते में शाम हो गई। उसने सोचा आगे जो गांव आयेगा तो वहां रात को रूक जाता हूं। थोड़ी दूर चलने पर एक गांव आया। गांव में प्रवेश करते ही एक कोल्हू वाले(तेल निकालने वाला) का घर था। मुसाफिर ने रात रूकने के लिए पुछा तो उसने कहा रूक जाओ कोई बात नहीं। संयोगवश व्यापारी की घोड़ी ने, जोकि गर्भवती थी, उसी रात एक बच्चे को जन्म दिया। सुबह जब मुसाफिर अपनी घोड़ी व उसके बच्चे को लेकर चलने लगा तो घर का मालिक बोला, ओ भाई इस ब...
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