सफलता राह देख रही है

 सफलता राह देख रही है


जीवन चलने का नाम है। कभी सफलता तो कभी असफलता का सामना हर मनुष्य को करना पड़ता है। लेकिन सफलताओं के मद में डूबकर या फिर असफलता के ग़म मे बह कर रुक जाना किसी भी दृष्टि में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जीवन की सफलता पीछे की कमजोरियों से सीख लेकर आगे की रणनीति बनाने और उसे अपने जीवन में उतारने में है। खुद का जीवन सफल हो और हम समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनें इसके लिए जीवन में सकारात्मक होना अतिआवश्यक है। नकारात्मक विचार व्यक्ति को पीछे धकेलते है। सभी मनुष्य अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए न केवल प्रयास करते हैं बल्कि जीतोड़ मेहनत भी करते हैं। लेकिन किसी कार्य की सफलता में मेहनत, संसाधन, हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ-साथ उस कार्य में लगन भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसको एक उदाहरण से समझिए। क्या आपने ध्यान दिया है कि सूर्य की किरणें अवतल शीशे से किसी एक वस्तु पर आपतित होती है तो वह वस्तु जल जाती है। क्योंकि सूर्य की शक्ति एक ही बिंदु पर केंद्रित हो जाती है और विखंडित न होने के कारण ऊर्जा एक जगह ही काम आने लगती है। फलस्वरूप वही ऊर्जा से जो अब तक बिखरी पड़ी थी, उसी वस्तु को जला डालती है। मानव मन भी इसी प्रकार है। इसमें भी ऊर्जा की कमी नहीं है अपितु बिखरी हुई है। यदि यह एक जगह केंद्रित कर ली जाए तो कोई भी कार्य असंभव नहीं है। इसे एक बिंदु पर केंद्रित करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। यह दृढ़ इच्छाशक्ति तभी पैदा हो सकती है जब हमारे अंदर किसी कार्य को करने की लगन लग जाए। हमें अपने आपको उस कार्य या उस सोच से उस हद तक जोड़ देना होगा जब तक उसकी अंतिम सीमा न आ जाए। जैसे हम गुब्बारे में तब तक हवा भरते हैं जब तक वह फटने की कगार पर न पहुंच जाए। मेरी नज़र में सफलता प्राप्त करने के लिए इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।
      किसी भी कार्य की सफलता में एक महत्वपूर्ण बिंदु वातावरण भी है। हमारे आसपास किस तरह का माहौल है, हमारे साथी किस तरह के हैं, उनकी विचारधारा किस तरह की है, आदि बातें भी कार्य की सफलता को प्रभावित करती है। जिस प्रकार फूल के रंग, रूप और गुण मनुष्य की मानसिकता प्रभावित करते हैं उसी प्रकार हर वह विचार जो हमारे आसपास पाया जाता है, जिसका कोई अस्तित्व है, वह भी हमारी सोच, हमारे कार्यों को सकारात्मक या नकारात्मक किसी न किसी रूप में प्रभावित अवश्य करते हैं। इनका प्रभाव इस रूप में सामने आता है कि हमने इन्हें किस तरह या किस रूप में ग्रहण किया है। एक और एक दो होते हैं तथा एक और एक ग्यारह भी होते हैं। यह हमारी सोच पर निर्भर करता है। अतः आवश्यक है कि हम अपनी सोच सकारात्मक रखें।
            कार्य की सफलता में एक अन्य बिंदु अपना आत्मविश्वास भी है। यदि हमारा आत्मविश्वास कार्य शुरू होने से पहले ही डगमगा गया तो सफलता की कुंजी वहीं खो जाएगी। यदि विश्वास गहरा है तो पत्थर भी हमारा सहयोगी बन जाता है और अगर विश्वास डगमगाया हुआ है तो एक जिंदा इंसान भी हमें किसी काम का नहीं लगता।
कई बार हम अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखते परंतु सफलता से फिर भी महरूम रह जाते हैं। ऐसी स्थिति में निराश होने की आवश्यकता नहीं है। असफलताएं हमें सुधार का अवसर देती है। असफलता के कारण ढूंढते हुए जो भी कमजोरियाँ रही हैं, उन्हें अपनी ताकत में बदलने का काम हमें करना है। इतिहास भी हमें यही सिखाता है कि भूतकाल की गलतियों से सीख लेते हुए आगे बढ़ें और कोशिश करें कि वे गलतियाँ दुबारा न दोहराई जाएँ। यदि हम अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बना लें तो हमें हमारी मंजिल तक पहुँचने से कोई नहीं रोक सकता।
आओ जागें, आगे बढ़े, पूरी कर्त्तव्य निष्ठा से, आत्मविश्वास से, लगन से, मेहनत से, हिम्मत से, सकारात्मक सोच के साथ अपनी मंजिल की तरफ चलें।
मैं अपनी बात स्वामी विवेकानंद के इस आह्वान के साथ समाप्त करता हूँ-
"उठो, जागो और आगे बढ़ो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल न प्राप्त कर लो।"


                                 -----रामकुमार भाम्भू
                                        

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