#सफर_जारी_है_21___

नमस्कार दोस्तो ।
दीपावली पर मोबाइल शुभकामना के संदेशों से भरा पड़ा है। कई बार इन संदेशों में कोई ऐसा संदेश भी आ जाता है जो दिल को छू लेता है। ऐसा ही एक संदेश आज आया। यह संदेश वास्तव में एक कंपनी विशेष का विज्ञापन है परन्तु इसके फिल्मांकन और इसके संदेश ने दिल छू लिया। राजस्थानी वेशभूषा में एक अम्मा मिट्टी के दिपक लेकर बैठी है और बड़ी आशा से आते जाते लोगों को देख रही है। सब उसकी तरफ देख कर आगे बढ़ जाते हैं और अन्य दुकान में सामान खरीदने लगे हैं। बुड्ढी अम्मा से दिपक कोई नहीं खरीदता। उसी भीड़ में एक छोटा बच्चा भी अपनी मां के साथ खरीददारी करने आया है। वापस जाते समय अपनी मां से दिपक खरीदने के लिए कहता है परन्तु उसकी मां इनकार करते हुए आगे बढ़ जाती है। उस बच्चे की आंखें मुड़-मुड़ कर अम्मा की आंखों में छिपी व्यथा की ओर जा रही है। थोड़ी देर बाद वह बच्चा वापस आता है और अम्मा से दिपक खरीदता है। अम्मा उसे दो चार ज्यादा ही देती है। जाते जाते कहता है, अम्मा फिक्र मत करो। आपके सारे दिपक बिक जाएंगे। अम्मा अचम्भे के साथ उसे जाते हुए देखती है। इसके बाद बच्चा कुछ ऐसा करता है कि बुढ़ी अम्मा के सारे दिपक बिक जाते हैं। जब अम्मा अपना समान समेट रही होती है तो वह दुबारा कहता है , अम्मा दिपक दो ना। अम्मा बिना देखे जवाब देती है, दिपक तो सारे बिक गए। "मैंने कहा था ना अम्मा, सारे दिपक बिक जाएंगे।" कहते हुए अपनी साइकिल से चल पड़ता है। तब अम्मा उसे पहचान कर रुकने के लिए कहती हुई उसके पीछे दोड़ती है तथा मार्ग में उस बच्चे द्वारा उसकी सहायता के लिए किए गए प्रयास देखती हुई भावविभोर हो जाती है ।
यह विज्ञापन से मुझे एक बात समझ आई कि हमारा एक छोटा सा प्रयास किसी के घर खुशियां फैला सकता है। अपने प्रयास से यदि किसी चहरे पर मुस्कान आती है तो उससे बढ़कर खुशी मेरे हिसाब से कुछ नहीं हो सकती। परंतु आज के इस भौतिकवादी युग में दूसरों की खुशी के लिए कोई समय नहीं निकालना चाहता।

काफी लंबी पोस्ट हो गई ..... मिलते है अगली पोस्ट में ...
नमस्कार......
परन्तु

सफर जारी है.......

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