#सफर_जारी_है_24

सूरतगढ़ का इंदिरा सर्किल। सुबह का समय। बस के इंतजार में सवारियाँ इधर-उधर खड़ी हैं। ज्यादातर नौकरीपेशा लोग और विद्यार्थी हैं जो रोजाना बस द्वारा अप-डाउन करते हैं। कुछ ग्रामीण बसों के माध्यम से सूरतगढ़ पहुंचे हैं और यहीं सर्किल से बस पकड़ेंगे। मेरे पास एक फौजी जवान खड़ा है जो छावनी एरिया में जाने के लिए किसी वाहन के इंतजार में है। उसके पास काफी सामान है। शायद छुट्टी मना कर आया है। थोड़ी देर बाद एक टेंपो आकर रुका।
ड्राईवर बोला "कहां चलना है साहब?"
"आर्मी केंट, क्या लेगा।" फौजी ने जवाब दिया ।
"ढ़ाई सौ रुपए दे देना?" ड्राईवर ने कहा।
फौजी बोला,"रहने दो। तुम जाओ।"
"आप बता दीजिए।" फौजी के कुछ और बोलने से ड्राईवर फिर बोला, चलो दो सौ दे देना।
"मैंने तुझे क्या कहा, सुनाई नहीं दिया। नहीं जाना, तुम जाओ।" फौजी ने तनिक क्रुद्ध होकर कहा।
टेंपो के जाने के बाद फौजी मुझसे बोला, दस बारह किलोमीटर के ढाई सौ रुपए मांग रहा है। शर्म नहीं आती। अभी कोई इनका साथी आ जाए तो मुफ्त में छोड़ आए। पिछले दस मिनट में तीसरा टेंपो है। मैं यह नहीं कहता कि सभी एक जैसे हैं। फिर भी सोचना चाहिए। किसी अनजान को देखकर उसका फायदा नहीं उठाना चाहिए। हम भी किसी जगह अनजान होते हैं। वहाँ कोई हमारा फायदा उठाए तो हमें कैसा लगेगा।
बस आते देख मैं बोला, आप इस बस में हमारे साथ चढ़ जाओ। ये आपको गेट पर उतार देगी। वहाँ से आपको अंदर जाने के लिए साधन मिल जाएगा। जवान मेरे साथ बस में चढ़ गया। मैं बैठा सोच रहा हूं कि फौजी के बात में दम है। कभी किसी का नाजायज फायदा उठाने का नहीं सोचना चाहिए। कभी हम भी ऐसी परिस्थिति में फँस सकते हैं ..........

सफर जारी है...........

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