सफर जारी है.....18..…( पिता )

कहा जाता है कि जैसे जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं वैसे वैसे उनका रवैया बदलने लगता है(सभी तो नहीं )। वे माता-पिता की अवहेलना करने लगते हैं। विशेषकर पिता के बारे में। वे अपनी जायज नाजायज गतिविधियों में उनको अड़चन मानने लगते हैं। लेकिन वे अपने पिता की मंशा को, जो कि इनकी भलाई के लिए होती है, समझ नहीं पाते। कुछ तो ऐसा भी कहते हैं कि इन्होंने हमारे लिए किया क्या है या इन्हें हमारी कोई फ़िक्र नहीं है। सभी ऐसे नहीं होते हैं इसलिए कोई अन्यथा नहीं लें। हम अपने माता-पिता के द्वारा हमारे लिए किए गए बलिदान का बदला नहीं चुका सकते। वे आज भी हमारे लिए फिक्रमंद रहते हैं ।
मध्यावधि अवकाश पर घर आया हुआ हूं। आज दोपहर में भाई ट्रैक्टर लेकर खेत जा रहा है तो मैं भी उसके साथ हो लिया। खेत ज्यादा दूर नहीं है । घर से लगभग 500-600 मीटर दूरी पर । 15-20 मिनट बाद पिताजी भी खेत पहुंच गए। कुछ देर खेत में घूमने के बाद वापस पैदल ही घर चलने का मानस बनाया। भाई खेत में काम लग गया। वो तो शाम तक घर जा पाएगा। मैं जब घर की तरफ चला तो पिताजी बोले,"कौन-से रास्ते से जाएगा। उधर खेत में थ्रेसर चल रहा है। ग्वार की कंपी आ रही है खुजली आने लगेगी। उधर दुसरे खेत से जाओगे तो रास्ते में तार आ जाएगी।"
"मैं चला जाऊंगा।" मैं ऐसा बोल कर चल पड़ा। थोड़ी दूर चलते ही खेत पड़ोसी मिल गए तो मैं उनके साथ बातचीत लग गया।
थोड़ी देर बाद घर की तरफ चला तो देखा कि पिताजी घर की तरफ जा रहे हैं। मैं इस उधेड़बुन में चल रहा था कि किस रास्ते से जाया जाए कि पिताजी का फोन आ गया। पिताजी ने ग्वार की कंपी से बचते हुए आने का मार्ग बताते हुए कहा कि इस तरफ से आ जाना। मैंने पूछा कि आप अभी खेत आए थे वापस कैसे आ गए। उनका उत्तर सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए श। उन्होंने कहा कि मैंने सोचा तु कहां से भटकते हुए आएगा। इसलिए मैं आगे आ गया और रास्ता देखकर बता दिया। अब वापस चला जाऊंगा।
सच में दोस्तो हमारे माता-पिता हमसे बहुत प्यार करते हैं। हमारी बहुत फिक्र करते हैं । बड़े भाग्यशाली होते हैं जिनके माता-पिता होते हैं। इसलिए हमें उनकी कीमत समझनी चाहिए.......

सफर जारी है.......

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