सफर_जारी_है.....17

सूरतगढ़ से सफर शुरू हो चुका है। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। बस मंथर गति से आगे बढ़ रही है। एक दो सवारियों को छोड़कर सभी अपनी अपनी सीट पर विराजमान। मैं और असलम भाई अपनी बातों में मशगूल हैं। हमारी सीट के बराबर एक महाशय खड़े हैं। कोशिश करने पर उनको बैठने की जगह मिल सकती है लेकिन हमारे से पिछे की सीट पर बैठी सवारी के साथ हथाई लगें हैं।
उनकी बातों से ये तो जाहिर हो गया कि दोनों अध्यापक पद पर है। जो महाशय खड़े हैं उन्होंने ने पूछा,"क्या तैयारी चल रही है।"
जवाब आया,"अभी तो कुछ नहीं। मैंने बी पी एड भी कर रखी है। शारीरिक शिक्षक भर्ती का परीक्षा दे रखी है। परिणाम का इंतजार है ।
"पेपर कैसा हुआ।"
"बढ़िया हुआ है। उम्मीद है हो जाएगा। तभी तो मैं तैयारी छोड़ रखी है। "
" आपने एम ए कर रखी है। व्याख्याता की तैयारी कर लेते।"
"नहीं, मेरा तो पी टी आई में हो जाए तो इस माथापच्ची से पीछा छुट जाए। मुझे पढ़ाना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।" सीट पर बैठी सवारी बड़ी लापरवाही से कहा।
मैं सदमे में हूं। कमाल है पढ़ाना भी माथापच्ची लग रही है। कोई कोशिश करने के बावजूद नौकरी नहीं लग पा रहा है। कुछ की सोच ऐसी है। किसी से क्या उम्मीद करें।

सफर जारी है.....

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