#सफर_जारी_है__5
6 दिवसीय प्रशिक्षण के बाद घर की तरफ रवानगी। बस अड्डे पर सवारियों की चील्ल-पों के साथ गुल्फी वाले की आवाज "दस की दो,दस की दो,दस की दो.." से सराबोर माहोल। बस खाली देखकर चढ़ा। एक सीट खाली देखकर उस पर बैठने लगा तो आवाज आई "भाई जी आ तो म्हारी रोके'ड़ी है।" मुझे एक सीट और खाली दिखाई दी जिस पर दो सवारी बैठ सके। मैंने दोनों सीटों पर कब्जा कर लिया। सोचा कोई जानकर आएगा तो बैठा लेंगे। वैसे भी लास्ट बस थी। ऐसा हर बस में होता है। जब तक बस घुम्मचक्कर से आगे न निकल जाए , सीट रोके रखतें हैं। पुछने पर बोलते हैं ,सवारी आने वाली है।ऐसा ही मैंने किया। था तो गलत, पर किया। बस अड्डे से निकल कर LIC के सामने पहुंची, तब तक कई सवारियां सीट के लिए पुछ चुकी थी। मेरा जवाब एक ही था, रटा-रटाया, सवारी आने वाली है।
LIC के सामने बस रूकी तो एक जानकार गुरूजी चढ़े। देखते ही आवाज लगाई,"आ जाओ गुरूजी, आपके लिए सीट रोक रखी है।"
"नमस्कार गुरूदेव , क्या हाल है।" कहते हुए मेरे बगल में बैठ गए।
"नमस्कार जी और सुनाओ क्या हाल है सर।" मैंने कहा।
LIC के आगे काफी सवारियां बस मैं चढ़ती है। बाजार से आने वाले सीधे यहीं से बस पकड़ते हैं। अब बस में काफी भीड़ हो रही है।
एक जाना-पहचाना चेहरा बस में आया। इस चेहरे को तब से देख रहा हूं,जब से समझ पकड़ी है। ये कभी 10 के पांच पेन, कभी 10 के तीन पते डाईक्लोविन गोली, कई बार चार भी दे देता है। आज बस में चढ़ा तो मुझे कुछ लंगड़ाते दिखाई दिया।
"लो जी भाई बस में आ गई है पुदीने, हरड़ की गोलियां। पेट दर्द ,खट्टी मीठी डकार, बदहजमी, बस में उल्टी आना, सब रोगो की एक ही दवा। कीमत है दस रूपए..दस रुपए..…दस रुपए...। लो जी आपके दस रूपए आ गए, लो जी आप भी लो..." इस प्रकार गले की चैन, टूथब्रश आदि तीन चार आईटम बेचे। अब अंतिम आईटम निकाल लिया, जो कि तेल था ।
"लो जी अब पेश है स्पेशल आईटम । ये विभिन्न जड़ी बूटियों से बनाया गया तेल है। कितना ही पुराना दर्द हो , इससे मालिश करो , दर्द गायब। जोड़ों का दर्द, कमर का दर्द, किसी भी प्रकार का दर्द हो सब में काम करता है। कीमत है जी ,पचास रुपए,पचास रुपए,पचास रुपए। जिसको भी लेना है जल्दी बोलो...." ऐसा कहते हुए उसने पांच छः लोगों को अपनी दवाई वितरित की। अभी पैसे इकट्ठे कर रहा है कि बस चल पड़ी। कडेंक्टर बोला , आगे सर्किल पर उतर जाना।वो मेरे पास ही खड़ा है । मैंने पूछा, "पैर में क्या हुआ?"
" कुछ नहीं जोड़ों में दर्द है।" जवाब मिला।
"आप लोगों को दर्द की दवा बेच रहे हो, खुद मालिश कर लो, सही हो जाओगे।" मैं बोला।
जवाब मिला,"बेटा 50% लोग कमर और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं। उनमें मैं भी शामिल हूं। ये दर्द जीवन के संघर्षों का है। पुरी जिंदगी दवाईयां बेचता रहा पर अपने लिए इतना धन इकट्ठा नहीं कर सका कि बुढ़ापा आराम से काट सकूं। ये सरकार बड़ी बड़ी कम्पनियों के लिए लोन उपलब्ध करवाती है परन्तु मेरे जैसे छोटे कामगारों के लिए कुछ नहीं। क्योंकि हमारे पास गारंटी नहीं है। अब तो ये दर्द मेरे साथ ही जाएगा। पापी पेट का सवाल है इसलिए इस हालत में बसों में सामान बेच रहा हूं।"
बस के ब्रेक लगे । घुमचक्कर यानि इंदिरा सर्किल आ चुका है । वो जल्दी से नीचे उतरा। मैं सोच रहा हूं क्या सचमुच इस दर्द की कोई दवा नहीं है......
सफर जारी है..........
सफ़र जारी रहे...
ReplyDeleteएवमस्तु....
जी आभार
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