लघुकथा बंटवारा
*बँटवारा*
घर का सारा सामान आँगन में निकाला जा रहा है। छोटी बड़ी जो भी वस्तु है, बाहर आ गई है। अब सभी वस्तुओं को बराबर चार भागों में बांटने का उपक्रम हो रहा है। सभी को एक जैसा मिले, ऐसा प्रयास हो रहा है। बहुएँ चालाकी करना चाहते हुए भी नहीं कर पा रही। पता नहीं कौनसा हिस्सा उनका हो। कहीं चालाकी के चक्कर में दूसरे को ज्यादा न मिल जाए। रामलाल ने आज चारों बेटों को अलग-अलग करने का फैसला कर लिया। पिछले साल भर से घर का माहौल लगातार ख़राब हो रहा है। छोटी-छोटी बातों के लिए माहौल तनावपूर्ण हो रहा था। अभी लड़ाई घर की दीवारों में ही है। यह निकलकर बाहर आए, इससे पहले रामलाल ने सबको अलग करने के बारे में निर्णय ले लिया।
जमीन और घरेलू सामान का बँटवारा होने के बाद सवाल खड़ा हुआ कि रामलाल और उनकी पत्नी किसके साथ रहेंगी। माँ-बाप दोनों छोटे के साथ ही रहना चाह रहे हैं क्योंकि स्वाभाविक तौर पर सबसे छोटी संतान से माँ-बाप का मोह ज्यादा होता है। परन्तु सबसे पहले उसी ने जवाब दे दिया। बच्चे छोटे होने का हवाला देते हुए कहा कि मेरे से इनकी सेवा नहीं हो पाएगी। मैं मेरे बच्चे पालूंगा या इनकी सेवा करूंगा।
माँ का हृदय यह सुन कर रो पड़ा। इसी दिन के लिए इन्हें पैदा किया था। उसे पता था कि आगे इससे भी कड़वी बातें होने वाली है इसलिए वह वहाँ से उठकर चली तो देखा कि बरामदे में एक नई दुनिया बसी हुई है। हमउम्र बुआ भतीजे-भतीजियों से घिरी बैठी है। यहाँ भी बँटवारा चल रहा है। बुआ बराबर-बराबर गुड्डे-गुड़ियों का, चाक-बरतों का, पेंसिल रबर, कोपी पेन का बँटवारा कर रही है। सभी अपना हिस्सा पाकर खुश हो रहें हैं। जैसे ही सारी चीजें बँट चुकी। सबसे छोटे बेटे की बेटी बोली कि एक चीज अभी नहीं बँटी है और वह मैं बाँटने भी नहीं दूंगी। सभी एक साथ बोल पड़े, "क्या?" "दादी-दादा, वो मेरे है और मैं इन्हें नहीं बाँटने दूँगी।" बरामदे में खड़ी दादी के आँसू बह रहे हैं और उधर चारों बेटे माँ-बाप को तीन-तीन महिनों के लिए बाँट चुके।
रामकुमार भाम्भू
1 एल एम सूरतगढ़
श्रीगंगानगर
*बँटवारा*
घर का सारा सामान आँगन में निकाला जा रहा है। छोटी बड़ी जो भी वस्तु है, बाहर आ गई है। अब सभी वस्तुओं को बराबर चार भागों में बांटने का उपक्रम हो रहा है। सभी को एक जैसा मिले, ऐसा प्रयास हो रहा है। बहुएँ चालाकी करना चाहते हुए भी नहीं कर पा रही। पता नहीं कौनसा हिस्सा उनका हो। कहीं चालाकी के चक्कर में दूसरे को ज्यादा न मिल जाए। रामलाल ने आज चारों बेटों को अलग-अलग करने का फैसला कर लिया। पिछले साल भर से घर का माहौल लगातार ख़राब हो रहा है। छोटी-छोटी बातों के लिए माहौल तनावपूर्ण हो रहा था। अभी लड़ाई घर की दीवारों में ही है। यह निकलकर बाहर आए, इससे पहले रामलाल ने सबको अलग करने के बारे में निर्णय ले लिया।
जमीन और घरेलू सामान का बँटवारा होने के बाद सवाल खड़ा हुआ कि रामलाल और उनकी पत्नी किसके साथ रहेंगी। माँ-बाप दोनों छोटे के साथ ही रहना चाह रहे हैं क्योंकि स्वाभाविक तौर पर सबसे छोटी संतान से माँ-बाप का मोह ज्यादा होता है। परन्तु सबसे पहले उसी ने जवाब दे दिया। बच्चे छोटे होने का हवाला देते हुए कहा कि मेरे से इनकी सेवा नहीं हो पाएगी। मैं मेरे बच्चे पालूंगा या इनकी सेवा करूंगा।
माँ का हृदय यह सुन कर रो पड़ा। इसी दिन के लिए इन्हें पैदा किया था। उसे पता था कि आगे इससे भी कड़वी बातें होने वाली है इसलिए वह वहाँ से उठकर चली तो देखा कि बरामदे में एक नई दुनिया बसी हुई है। हमउम्र बुआ भतीजे-भतीजियों से घिरी बैठी है। यहाँ भी बँटवारा चल रहा है। बुआ बराबर-बराबर गुड्डे-गुड़ियों का, चाक-बरतों का, पेंसिल रबर, कोपी पेन का बँटवारा कर रही है। सभी अपना हिस्सा पाकर खुश हो रहें हैं। जैसे ही सारी चीजें बँट चुकी। सबसे छोटे बेटे की बेटी बोली कि एक चीज अभी नहीं बँटी है और वह मैं बाँटने भी नहीं दूंगी। सभी एक साथ बोल पड़े, "क्या?" "दादी-दादा, वो मेरे है और मैं इन्हें नहीं बाँटने दूँगी।" बरामदे में खड़ी दादी के आँसू बह रहे हैं और उधर चारों बेटे माँ-बाप को तीन-तीन महिनों के लिए बाँट चुके।
रामकुमार भाम्भू
1 एल एम सूरतगढ़
श्रीगंगानगर
Waaah
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