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बचपन की नादानियां याद आती है तो चेहरे पर बरबस मुस्कान खिंची चली आती है। आज की पीढी के हिसाब से देखें तो मुझे तो कम से कम नासमझ समझा जा सकता है। मेरे ज्यादातर सहपाठी भी इस वर्ग में शामिल माने जा सकते हैं। गाँव में स्कूल नहीं होने के कारण माध्यमिक तक की शिक्षा मैंने अपने अलग-अलग रिश्तेदारों के यहाँ रहकर प्राप्त की। इस क्रम में उच्च प्राथमिक शिक्षा यानि 6 से 8 कक्षा मैंने मेरे पिताजी के ननिहाल कूपंली रहकर प्राप्त की। मैं जिस घटना का जिक्र करने जा रहा हूँ वह आठवीं की है। मैं आठवीं कक्षा में राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय कूपंली में अध्ययनरत था। मेरे सहपाठियों में अशोक चौहान, वेद डूडी, मुकेश खीचङ, भैराराम, रामकुमार मेघवाल आदि खूब धमाल मचाया करते। उस समय के गुरुजनों में मनीराम जी सुथार, मल्ली जी, मीणा जी, यादव जी और चावला जी होते थे। मेरा सौभाग्य है कि इनमें से चावला जी यानि पृथ्वीराज जी चावला और मैं वर्तमान में एक ही विद्यालय में अध्यापन करवा रहे हैं।
हुआ यूँ कि मुकेश यादव जी ने अपना तबादला अपने गाँव की तरफ करवा लिया। विद्यालय में सूचना दे दी गई कि इस दिनांक को यादव जी को विदाई पार्टी दी जाएगी। इसलिए सभी इतनें इतने रुपये लाकर अपने कक्षाध्यापक को जमा करवाएं। हमारी कक्षा सबसे सीनियर थी और मुकेश जी हमारे प्रिय अध्यापक। इसलिए हम सबने मिलकर गुरूजी को अलग से कुछ देने का निर्णय लिया। सबने 10-10 रुपये इक्कठे किए। 35 या चालीस की कक्षा थी। कुछ ने दिए नहीं। कुल 320 रुपये जमा हो सके। यादव जी और मीणा जी दोनों स्कूल में ही रहते थे। मनीराम जी गाँव के ही थे। मल्ली जी 56 जीबी से आते थे और चावला जी रामसिंहपुर से। यानी मल्ली जी या चावला जी से गिफ्ट मंगवाने के बारे में विचार किया तो किसी साथी ने कहा कि यह सही नहीं रहेगा। अपने को सरप्राईज देना है। यहां आपको बता दूं कि हमें अलग से किसी प्रकार का गिफ्ट्स देने से मना किया गया था। अब समस्या यह आ गई कि गिफ्ट लाया कैसे जाए। हम में से ज्यादातर ने बाजार का मुँह भी शायद ही किसी ने देखा हो। हालांकि कस्बा रामसिंहपुर केवल आठ किमी की दूरी पर स्थित था। आज के जमाने की बात और है। आजकल आठवीं कक्षा का बच्चा काफी समझदार होता है। आज के अभिभावक भी बच्चों को अपने साथ इधर उधर ले जाते रहते हैं। फलस्वरूप मन का भय खुल जाता है। आखिर में सभी इस निर्णय पर पहुँचे कि मैं और अशोक चौहान जाएंगे और गिफ्ट लाएंगे। हम भी तैयार हो गए। अशोक तो एक दो बार रामसिंहपुर गया हुआ था और मेरे मन में बाजार देखने की जिज्ञासा थी। अशोक अपने घर लाडला था। उसे घरवाले ज्यादा रोकते टोकते नहीं थे। मैंने हाँ तो भर ली परन्तु दादाजी जी से पूछने की हिम्मत नहीं थी। मैंने अशोक से कहा, अब क्या किया जाए? अशोक ने कहा कि कुछ नहीं, आधी छुट्टी होते ही निकल जाएंगे। बीस मिनिट जाते लगेगी और बीस आते। आधे घंटे में गिफ्ट खरीद लेंगे। चालीस मिनिट की आधी छुट्टी होती ही है। एक कालांश देर से सीधे कक्षा में आ जाएंगे। हम चल पड़े दोनों। यह सोचा ही नहीं कि हमारे लिए कोई बस तैयार तो खड़ी नहीं है। हम बस स्टैंड जाएंगे। बस हमें बाजार ले जाएगी। दुकान के आगे उतारेगी। हम गिफ्ट खरीदेगे। दूकानदार हमारे लिए तैयार बैठा है और बस हमें वापस ले आएगी। एक घंटे के इंतजार के बाद बस आई। पूरी तरह से ठसाठस भरी। जैसे तैसे पहुंच तो गए परन्तु दोनों ही दुकान नहीं जानते कोई भी। किस दुकान से ले और क्या ले। तभी याद आया कि यहां अशोक बब्बर जी की दुकान है और उनका कूंपली में संतोष गुरुजी के साथ अच्छी मित्रता है। जैसे तैसे पूछताछ करके उनकी दुकान पहुंच गए। उनको इस डर से कि कहीं घर बता न दे, बिना पहचान बताए हमने कहा कि गिफ्ट लेना है। बब्बर जी ने पूछा कि क्या लोगे। हमने कहा, 300 रुपये है हमारे पास। आप अपने हिसाब से दिखा दो। उन्होंने तीन चार आइटम दिखाए। उनमें से हमें भारत के नक्शे वाली एक दीवार घड़ी पसंद आई। हमने कहा, जल्दी से पैक कर दो। मूल्य पूछा तो बोले कि है तो 330 रुपये की। आप तीन सौ दे दो। उन्होंने पैक कर दी। रुपये देते हुए मैने कहा कि कुछ तो वापस करो। उन्होंने दस रूपये वापस कर दिए। वापस बस स्टैंड आते समय हिसाब मिलाया तो बीस रुपए आने जाने का किराया, दो सौ नब्बे की घड़ी के बाद दस रुपए बच रहे थे। सोचा दस रुपए को क्या वापस करना। आखिर गर्मी में इतनी मेहनत की है। कुछ मेहनताना तो बनता ही है। फिर क्या था, दोनों ने पांच पांच की आइसक्रीम खा ली।
बस स्टैंड पर फिर आधे घंटे का इंतज़ार। स्कूल पहुंचे तो अंतिम पीरियड चल रहा था। कक्षा में चावला जी थे। अंदर घुसते ही दहाड़े, कहां से आ रहे हो। क्या लाए हो, इधर लाओ। सरप्राइज तो रहा एक साइड, मार और पड़ने का चान्स बन गया। डरते डरते गए और गिफ्ट उनको पकड़ा दिया। वे सारा माजरा समझ गए। चावला जी बोले, खोलकर देख लूं। हम मार के डर से चुप ही रहे। उन्होंने उस पैकेट को खोला और कहा कि है तो सुंदर। जैसे ही घड़ी को घुमाकर देखा, जोर से हंसते हुए बोले, नालायको मुझसे ही मंगवा लेते। घड़ी लाए हो, आगे आगे का ढांचा है, इसकी मशीन और सेल तो है ही नहीं। ऐसी घड़ी दोगे। हमने सोचा ऐसे कैसे हो सकता है। देखा तो वास्तव में पीछे कुछ नहीं था। पूरी कक्षा हमें देखकर मुस्कुरा रही थी। जल्दबाजी में हमने घड़ी चैक की ही नहीं और दुकानदार ने भी वैसी ही पैक करदी। चावला जी ने हमें समझाते हुए कहा कि कभी भी कोई काम बिना सोचे समझे और जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए। लापरवाही से किया गया काम नुकसानदेह हो सकता है। स्कूल से ऐसे बिना बताए नहीं जाना चाहिए। कुछ हो जाए तो हम आपके अभिभावकों को क्या जवाब देते। कोई बात नहीं, आगे ध्यान रखना। ये गिफ्ट मैं बदला लाऊंगा, चिंता मत करो। दुसरे दिन चावला जी घड़ी बदलाकर लाए। पूरी कक्षा ने मिलकर यादव जी को भेंट की।
अब भी जब कभी पुराने साथी मिलते हैं तो ऐसी घटनाएं याद कर खूब हंसते हैं। मैं भी जब कोई सामान खरीद रहा होता हूं तो चेहरे पर मुस्कान बरबस खींची चली जाती है....



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