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सफलता राह देख रही है

  सफलता राह देख रही है जीवन चलने का नाम है। कभी सफलता तो कभी असफलता का सामना हर मनुष्य को करना पड़ता है। लेकिन सफलताओं के मद में डूबकर या फिर असफलता के ग़म मे बह कर रुक जाना किसी भी दृष्टि में उचित नहीं ठहराया जा सकता। जीवन की सफलता पीछे की कमजोरियों से सीख लेकर आगे की रणनीति बनाने और उसे अपने जीवन में उतारने में है। खुद का जीवन सफल हो और हम समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनें इसके लिए जीवन में सकारात्मक होना अतिआवश्यक है। नकारात्मक विचार व्यक्ति को पीछे धकेलते है। सभी मनुष्य अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए न केवल प्रयास करते हैं बल्कि जीतोड़ मेहनत भी करते हैं। लेकिन किसी कार्य की सफलता में मेहनत, संसाधन, हिम्मत और आत्मविश्वास के साथ-साथ उस कार्य में लगन भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसको एक उदाहरण से समझिए। क्या आपने ध्यान दिया है कि सूर्य की किरणें अवतल शीशे से किसी एक वस्तु पर आपतित होती है तो वह वस्तु जल जाती है। क्योंकि सूर्य की शक्ति एक ही बिंदु पर केंद्रित हो जाती है और विखंडित न होने के कारण ऊर्जा एक जगह ही काम आने लगती है। फलस्वरूप वही ऊर्जा से जो अब तक बिखरी पड़ी थी, उसी...

सफर जारी है 38

 #सफर_जारी_है_38 मौसम फिर बदलाव की तरफ है। बादल अपना डेरा लेकर वापस आ गए हैं। सूर्योदय के बाद भी हल्की ठंड बरकरार है। बस आ गई। आज भीड़ ठीक-ठाक है। मेरी सीट आरक्षित है। असलम भाई बस स्टैंड से ही बस में बैठ जाते हैं और मेरी जगह भी रोक लेते हैं। आज सीट भर चुकी है। एक बुड्ढी मां को असलम भाई ने सीट दे दी। मुझे देखते ही खड़े होते हुए बोले,"आओ रामजी। बैठो।" मैंने मना किया फिर भी ज़बरदस्ती बिठा ही दिया। बस रफ्तार पकड़ चुकी है। मानकसर आवरब्रिज से निकलते समय धान की फसल की सुगंध मुझे अपनी और आकर्षित करने लगी। क्या शानदार नजारा है। पहले जो चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नज़र आती थी अब वहां पिली चद्दर बिछी है। धान अब परवान पर है। जहां तक नजर जाती है धान की लहलहाती फसल नजर आ रही है। इस सुंगध में किसान के पसीने की गंध भी शामिल है। काफी मेहनत का परिणाम है यह सुगंध। बुड्ढी मां ने पास ही खड़े जानकर युवक के साथ बातचीत शुरू कर दी। घर परिवार की बातें करते हुए उह युवक से पुछा,"आजकल क्या कर रहे हो। कहीं काम लगे हो या फिर खाली बैठे हो।" "मैंने दुकान कर ली दादी। दो तीन साल इधर उधर काम...

सफर जारी है 37

#सफर_जारी_है_37 बस के इंतजार में खड़ा हूं। राष्ट्रीय राजमार्ग होने के कारण हर दस मिनट बाद बस मिल जाती है। एक बस अभी सामने से निकल गई। दूसरी बस में अभी दस मिनट है। दोपहर का समय होने के कारण कुछ धूप है। परन्तु मौसम में ठंडक होने के कारण इतनी महसूस नहीं हो रही। मैं, असलम जी, भाग सिंह जी, प्रतिमा जी और हिमानी जी आपस में बातचीत में मशगूल हैं। विद्यालय के दो पूर्व छात्र आए। नमस्कार के बाद असलम जी ने उनकी पढ़ाई की बात शुरू कर दी। एक विद्यार्थी बोला, सर मैं पटवारी की तैयारी कर रहा हूं। मुझे हर हाल में नौकरी लगना है। घर का माहौल पढ़ाई के लिए सही नहीं है। कभी कोई समस्या तो कभी कोई। इससे मेरा ध्यान पढ़ाई में लग नहीं पाता। मुझे क्या करना चाहिए। असलम जी कोई जवाब देते उससे पहले प्रतिमा जी बोल उठे, तुम्हारे प्रश्न का जवाब मैं देती हूं। मैंने कहीं एक कहानी पढ़ी थी। उसे सुनकर तुम निर्णय करना कि क्या करना है। किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी, जिसका प्रसव होने को ही था। उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घास के पास एक जगह देखी जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा। ...

सफर जारी है 36

#सफर_जारी_है_36 भयंकर गर्मी, गर्मी के बाद बारिश, फिर गर्मी और अब फिर बारिश। मौसम खुशगवार है। सफर शुरू हो चुका है। इन दिनों खेतों में फसलें पूरी रंगत में है। किसानों के चेहरे खिले हुए हैं। उनकी खुशी उनकी बातों से झलकती है। अगर किसान है, तो खेतों में जान है। खेतों में जान है तो किसान के चेहरे पर मुस्कान है। एक सीट पर मैं और असलम बैठे हैं तो बराबर की सीट पर किसान भाई बैठे हैं। उनकी चर्चा का विषय खेती-बाड़ी है। "अबकी बार नरमा अच्छा खड़ा है।" एक किसान बोला। दूसरे ने कहा,"हां। इस बार मौसम साथ दे रहा है और नहरों में भी पानी समय पर आ रहा है।" पहले ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,"मेरे आठ बीघो में जिनमें पहले बिजाई की थी, अच्छा है। बाकी कुछ हल्का है।" दोनों की बातचीत में तीसरा शामिल होते हुए बोला, "दोनों में फर्क तो होगा ही। पहले वाले में तुमने दो बार कल्टीवेटर लगाए। फिर एक बार तोई से जमीन को दुबारा अच्छी तरह मिलाया। फिर एक बार फिर कल्टीवेटर लगाने के बाद बिजाई की है। दूसरे में एक बार ही कल्टीवेटर लगाने के बाद बिजाई कर दी। जैसी मेहनत की है वैसा तो खड़ा ही है।...

सफर जारी है 35

#सफर_जारी_है 35 सुबह का मौसम। दिन में तापमान लगभग 41-42 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और रात में बहुत नीचे। भोर में इतनी ठंड होती है कि एक कंबल में भी सर्दी का अहसास होता है। इस रात की ठंडक का अहसास सुबह तक रहता है। ऐसा ही इस समय का मिजाज है। इस मौसम में यही पल सुकून देते हैं। बस पेट्रोल पंप से निकल चुकी है। बराबर की सीट पर एक महिला अपने बच्चे के साथ बैठी है। बच्चे ने अपनी मां के हाथ से मोबाइल ले लिया। अब अपनी मां से लॉक खोलकर देने की जिद कर रहा है। मां एक बार लॉक उसके सामने खोलकर बंद करते हुए बोली, "अब जैसे मैंने लॉक खोला उसी प्रकार अपने आप खोल लो।" आजकल लोग लॉक बड़े उटपटांग ढंग से लगाते हैं। एक व्यस्क भी एक बार देखने के बाद बड़ी मुश्किल से खोल पाता है। लेकिन बच्चा बिना सवाल जवाब किए अपनी कोशिश में लग गया। वह बार बार कोशिश कर रहा है लेकिन सही तरीके से नहीं लगने के कारण मोबाइल का लॉक खोल नहीं पा रहा है। एक विशेष बात देखने में आई कि वह हर बार नए तरीके से कोशिश कर रहा है। लगभग पंद्रह मिनट की मेहनत के बाद वह मोबाइल का लॉक खोलने में सफल हो गया। अब उसके चेहरे की खुशी देखने ...

सफर जारी है 34

सफर जारी है ..34 राजस्थान रोडवेज की बस। सूरतगढ़ श्रीगंगानगर मार्ग पर लोक परिवहन की हर दस मिनट बाद बस है और किराये में अंतर होने के कारण रोडवेज में भीड़ भी कम होती है। मैं, असलम जी और भाग सिंह जी एक ही सीट पर बैठे हैं। सीट पर बैठते ही हम अपनी बातों में मशगूल हो जातें हैं। आज भी कुछ ऐसा ही हुआ। कन्डेक्टर टिकट काटते हुए हमारी सीट के पास आ गया। असलम जी को देखते ही बोल पड़ा,"ओहो गुरुदेव क्या हाल है।" असलम जी भी कन्डेक्टर को देखते ही बोले, "अरे.. मेरे अज़ीज़। बहुत बढ़िया। आप सुनाओ। काफी दिनों बाद दिखाई दिए।" सामने से जवाब आया कि अभी काफी दिनों से छुट्टी पर था। अभी कल ही वापस आया हूं। इस मार्ग पर भी काफी समय बाद ड्यूटी लगी है। सामान्य शिष्टाचार बातचीत के बाद असलम जी ने पढ़ाई के बारे में पुछा कि तैयारी कर रहे हो या छोड़ दी। दरअसल उन्होंने एम. ए. बी. एड. कर रखी है। इस प्रश्न का जवाब बहुत ही शानदार दिया- मैं हिम्मत नहीं हारने वाला। मेरी तैयारी बदस्तूर जारी है और तब तक जारी रहेगी जब तक मैं अपनी मंजिल न पा लूं। सफलता कब तक भागेगी। उसे मेरा वरण करना ही होगा। ...

सफर जारी है 33

#सफर_जारी_है_33 कल ताराचंद जी के साथ खेतों में घुमते हुए घर पहुंचे तो पिताजी कमरे के आगे चौक पर बैठे थे। खेतों में काफी समय लगा दिया तो ताराचंद जी सीधे स्कूल में अपने कमरे जाना चाहते थे। परन्तु पिताजी को देखकर मेरे साथ ही वहीं हथाई में मशगूल हो गए। मेरे छोटे चाचा श्री शंकर और मेरे पिताजी के चचेरे भाई श्री जगदीश भी हमें देखकर हथाई के उद्देश्य से पास आकर बैठ गए। #हथाई_भी_आजकल_लुप्त_होती_जा_रही_है_भला_हो_हमारे_गांवो_का_जिन्होने_इसे_बचा_रखा_है गांवों में भी धीरे धीरे बदलती सोच और माहोल के कारण लोग अपने आप में सिमटते जा रहें हैं। इसलिए गांव आने पर इस प्रकार के हथाई के मौके मैं छोड़ता नहीं हूं। हथाई चलते चलते पढ़ाई के बिंदु पर आ गई। जिन बच्चों के माता-पिता उन्हें पढ़ाना चाहते हैं और जो या तो स्कूल पहुंचते नहीं या फिर बीच में भाग जाते हैं, उनके न पढ़ने का दोष किसे दिया जाए, यह चर्चा का विषय था। हम सब अपने अपने मत रख रहे थे तो जगदीश चाचा श्री बोले कि मां बाप को क्या दोष दें। मुझे बुआजी के पास 32 एम एल पढ़ने भेजा। हम रतनपुरा पढ़ने जाते थे। बुआजी हमारे साथ चुरमा और अचार रोट...